मा बलि दान की पन्नाधाय वात्सल्य की यशादा जीवन की विश्व्।कर्मा शिक्षा की कुबैर वीरता की दुर्गा
गुरुवार, 5 सितंबर 2013
सोमवार, 2 सितंबर 2013
मां पर पांच प्रमुख किताबें ।
मां पर पांच प्रमुख किताबें ।
1. माय हालीबुड
मोना सिम्पसन
2. लवयू फारएवर
राबर्ट मंश
3. मां
मुंशी प्रेमचंद
4. चिकनसूप फार एवरी माम्स सोल
जेक, मार्क हीथर
5. सीक्रेट डाटर
शिल्पी सोमैया
maa मा umeshgupta
गुरुवार, 22 अगस्त 2013
श्री देवीचरण गुप्ता
श्री देवीचरण गुप्ता
हमने भगवान को तो नहीं देखा,लेकिन ‘‘मॉ‘‘ के रूप में भगवान की अनुभूति हर व्यक्ति करता है । इसलिये मॉ की तुलना भगवान से की गई है । इस पुस्तक में मॉ के संबंध में समाज में प्रचलित उक्तियों को एकत्र किया गया है तथा लेखक द्वारा भी इस संबंध में कुछ अलग प्रयास किया गया है,जो प्रस्तुत है:-
हमने भगवान को तो नहीं देखा,लेकिन ‘‘मॉ‘‘ के रूप में भगवान की अनुभूति हर व्यक्ति करता है । इसलिये मॉ की तुलना भगवान से की गई है । इस पुस्तक में मॉ के संबंध में समाज में प्रचलित उक्तियों को एकत्र किया गया है तथा लेखक द्वारा भी इस संबंध में कुछ अलग प्रयास किया गया है,जो प्रस्तुत है:-
यह
पुस्तक अपने
पूज्य पिता
श्री देवीचरण
गुप्ता की
स्मृति में
प्रकाशित
की जा
रही है,
जिनका
दुखद निधन
दिनांक
16-5-2007 को
जबलपुर में
हो गया
है ।
पिता
जी श्री
देवीचरण
गुप्ता का
जन्म उत्तर
प्रदेश के
मैनपुरी जिले
के साढूपुर
गांव में
वर्ष 1934
में
हुआ था
। अल्प
अवस्था में
ही गांव
में फैली
प्लेग महामारी
से माता
श्रीमती
रामदेई गुप्ता
का निधन
हो जाने
के कारण
दादा सावलदास
गुप्ता गांव
छोड़कर जबलपुर
मध्यप्रदेश
घमापुर चौराहा
में आकर
बस गये
थे ।
जहां पर
उन्होने अपना
पुश्तैनी
व्यवसाय
‘‘हलवाई ‘‘
का कार्य
प्रारंभ किया
था ।
बाबू
जी श्री
देवीचरण
गुप्ता ने
प्रांरभिक
शिक्षा जबलपुर
के सुप्रसिद्ध
स्कूल मॉडल
हाईस्कूल
में प्राप्त
की थी
और उसके
बाद राबर्टसन
कालेज जबलपुर
में आगे
की कुछ
शिक्षा प्राप्त
की थी
।
पिता
जी जो
बचपन से
ही स्कूल
के मेघावी
एंव प्रतिभावान
छात्र होने
के कारण
साथियों और
शिक्षको में
काफी लोकप्रिय
थे ।
स्कूली शिक्षा
के दौरान
ही उनकी
उनकी गिनती
शहर के
नामी खिलाड़ियों
और पहलवानो
में होती
थी ।
हॉकी ,दौड़
ट्रिपल जम्प
आदि प्रतियोगिताओं
में उन्हें
कई मेडल
प्राप्त हुये
थे ।
पिता
जी को
खेलकूद के
साथ ही
साथ कसरत
का बहुत
शौक था
और इस
कारण उन्होंने
बॉडी बिल्डिग
(शरीर
सौष्ठव) का
चयन किया
था ।
शरीर सौष्ठव
के क्षेत्र
में वे
इतने प्रसिद्ध
थे कि
उनके शारीरिक
सौन्दर्य
विशेषकर हाथ
की मांसपेशियो
की विशेष
चर्चा शहर
में होती
थी ।
इसी कारण
जब भी
जबलपुर के
बॉडी बिल्डरों
का इतिहास
लिखा जायेगा
उनमें एक
नाम श्री
देवीचरण
गुप्ता का
भी अवश्य
रहेगा ।
पिता
जी का
विवाह 22-23
वर्ष
की अवस्था
में इलाहाबाद
के प्रसिद्व
‘‘रैली‘‘
खानदान लाला
रामदयाल
हरविलास, जगदीश
प्रसाद, हनुमान
डालडा घी
वालों के
यहां श्रीमति
माया गुप्ता
के साथ
सम्पन्न हुआ
था ।
उनकी पत्नी
एंव मेरी
माता जी
एक सभ्रान्त
शिक्षित
सुशील सर्वगुण
सम्पन्न
सिलाई-कढ़ाई
में बेहद
निपुण महिला
है ।
जिन्होने
हर कदम
पर उनको
बराबर का
साथ दिया
है ।
विवाह
के बाद
पिताजी ने
अपने परिवार,
जिसमें
उनके बड़े
भाई स्व.
श्री
सत्य नारायण
गुप्ता, स्व.श्री
अटल बिहारी
गुप्ता, श्री
दुर्गा प्रसाद
गुप्ता के
कुशल मार्गदर्शन
में अपना
खुद का
व्यवसाय होटल
‘‘ न्यू आनंद
भंडार ‘‘
दूसरा पुल
जबलपुर में
प्रारंभ किया
जो आज
तक कायम
है ।
पिताजी
ने अपने
सम्पूर्ण
जीवनकाल में
प्रसिद्ध
व्यापारी, व्यवसायी,
समाजसेवी,
राजनैतिज्ञ
के रूप
में कार्य
किया और
अपने बच्चों
को अच्छे,
आचार-विचार,
व्यवहार,
अनुशासन
तथा सदाचार
की शिक्षा
दी, जिसके
कारण उनके
कुशल मार्गदर्शन
में उनके
हर बच्चे
ने उच्च
शिक्षा प्राप्त
की है
और आज
सभी बच्चे
समाज में
प्रतिष्ठा
के पात्र
हैं ।
उनके
बड़े पुत्र
डा. दिनेश
कुमार गुप्ता
बायोकेमेस्ट्री
में (पी0एच0डी0)
डी.फिल
है ।
उसके बाद
दो पुत्र
न्यायाधीश
हैं जिनमें
एक श्री
योगेश कुमार
गुप्ता अपर
जिला न्यायाधीश
कोर्ट सागर
में तथा
दूसरे उमेश
कुमार गुप्ता,
रायसेन
में अपर
जिला न्यायाधीश
के रूप
में वर्तमान
में पदस्थ
है ।
चौथे पुत्र
मणीकांत
गुप्ता
पुश्तैनी
होटल व्यवसाय
संभाल रहे
हैं ।
पांचवे पुत्र
श्री अमीकांत
गुप्ता एडवोकेट
थे, जिनका
एक सड़क
दुर्घटना
में दुखद
निधन हो
गया ।
उसके बाद
एक पुत्र
अभयकांत
गुप्ता
कम्प्यूटर
शिक्षा के
क्षेत्र में
कार्यरत है
। उनका
खुद का
कम्प्यूटर
शिक्षा संस्थान
जबलपुर में
है ।
उनकी एक
मात्र पुत्री
दीपाली गुप्ता
ने भी
होमसाईन्स
में उच्च
शिक्षा प्राप्त
की है
। जिनका
विवाह भोपाल
में व्यवसायी
श्री संदीप
गुप्ता से
हुआ है
। भोपाल
में गुप्ता
इन्ड्रस्टीज
के नाम
से व्यवसाय
करते है
।
पिताजी
ने अपने
जीवनकाल में
अनेक सामाजिक,
आर्थिक,
राजनीतिक
कठिनाईयों
का सामना
करते हुये
अपने बच्चो
को उच्च
शिक्षा प्रदान
की है
। उन्हें
विरोधी पार्टी
का सक्रिय,
तेजतर्रार,
बेबाक
सदस्य होने
के कारण
सत्तारूढ़
पार्टी के
कोपभाजन का
भी शिकार
होना पडा
है ।
इतना सब
होने के
बाद भी
उन्होने किसी
कठिनाई के
सामने अपना
सिर कभी
नहीं झुकाया
और बड़ी
निर्भिकता, निडरता
से हर
मुश्किल का
सामना किया
है ।
बाबूजी
की गिनती
समाज में
साहसी, निडर,
आत्मविश्वासी,
कार्यशील,
पुरूषों
में की
जाती है
। उन्होने
हमेशा मौलिक
कार्य और
विचारों को
प्राथमिक्ता
प्रदान की
है ।
उनके सोचने
का ढंग
सर्व साधारण
व्यक्तियों
से एकदम
अलग ,खास
और मौलिक
था ।
जिसके कारण
उनकी एक
विशेष प्रकार
की कार्यशैली
निर्मित हुई
थी ।
जीवन
की गहरी
वास्तविकता
को जानकर
उसे सहज
ढंग से
अपने कठोर
परिश्रम से
हल कर
देने के
कारण वह
समाज में
दूसरों से
एकदम अलग
जान पड़ते
थे ।
उनकी नजर
में जो
वे योजनाऐं
बनाते थे
,उसे
सौ फीसदी
गांरटी के
साथ पूरा
भी करते
थे ।
इसलिये उनकी
सफलता में
चट्टान सी
मजबूती नजर
आती थी
। अपनी
बुद्धिमत्ता
और प्रयोगों
से एक
नवीन मार्ग
पर चलते
हुये कुछ
अलग कर
दिखाने की
गजब क्षमता
के कारण
उन्होने अपने
परिवार, संगठन,
मैेनेजमेंट
में भरपूर
सफलता प्राप्त
की थी
।
पिताजी
को पढ़ने,
मनन,
सुनने
तथा घूमने
का शौक
था ।
बारीक तथा
गूढ़ विषयों
को सहजता
से समझ
लेना, वांणी
को धारा
प्रवाह
प्रवाहित
करना, विविध
विषयों की
जानकारी
रखना, विषयों
की पसदंगी
रूचि के
अनुसार रखना
उनके शौक
में शामिल
होने के
कारण वे
सब बातें
उनके स्वभाव
का एक
हिस्सा बन
गई थी
।
हमेशा
आशावादी
दृष्टिकोण, उदारता,
स्वतंत्रता,
निडरता,
निर्भिकता
के कारण
परम्परावादी, परिस्थितियों,
रूढ़ीवादी,
ताकतों,
दकियानूसी
विचारों
संस्कारों
की परवाह
किये बिना
निर्विरोध
रूप से
काम करना
उनकी आदत
थी। धैर्य,
मिलनसार
स्वभाव तथा
विचारों से
सदा भरा
मस्तक होने
के कारण,
उन्हें
सामाजिक, कानूनी,
नैतिक
बाधाओं को
तोड़कर भी
कार्य करने
में कोई
हिचक नहीं
थी। इसी
कारण वे
समाज में
अपने सीधे
खड़े बोलों,
विचारो
अभिव्यक्तियों
के लिये
‘‘जगप्रसिद्ध‘‘
थे ।
पिता
जी, सामाजिक
धार्मिक
कार्यो, उत्सवों
में बढ़
चढ़ कर
हिस्सा लेते
थे ।
माथुर वैश्य
शाखा सभा
जबलपुर, दुर्गा
उत्सव समिति
घमापुर-बाई
का बगीचा,
आदि
संस्थाओं
के लिये
उन्होने
बढ़चढकर कार्य
किया था
। इस
कारण उनका
समाज में
अच्छा मेलजोल
था ।
बाबूराव
पंराजपे
सांसद, ओंकार
तिवारी विधायक
एंव मंत्री,
कैलाश
सोनकर विधायक,
के.जी.
श्रीवास्तव
,अरूणदास
एडवोकेट, विशाल
पचौरी विधायक
आदि कई
राजनीतिज्ञो
,समाज
सेवियों से
उनके अच्छे
संबंध थे
। समाज
में उनके
मित्रों का
अच्छा समूह
था ।
हमेशा नऐ
लोग मार्गदर्शन
प्राप्त करने
उनसे जुड़े
रहते थे
। उनकी
युवा वर्ग
में भी
अच्छी पहचान
थी ।
बाबूजी
अपने वालों
की जरूरत
से ज्यादा
चिन्ता, दरकार,
लाड़
प्यार ओर
विश्वास करते
थे ।
इस कारण
भी उन्हें
जीवन में
कई बार
कपट, फरेब,
धोखे
का भी
शिकार होना
पड़ा है
। इसी
कारण राजनीति
के शिखर
पर पहुंचने
के बाद
भी उन्होने
राजनीति को
‘‘ अलविदा
‘‘ कहा था
। उन्हें
कई बार
गलत लोगों
पर विश्वास
करने, दूर
अन्देशी का
त्याग करने
के कारण
भी नुकसान
उठाना पड़ा
है ।
भरपूर
प्यार, सच्चाई
से भरा
हृदय होने
के कारण
जब उनके
दिल की
भावनाओं पर
आक्रमण होता
था तब
संघर्ष की
स्थिति निर्मित
होती थी
और ईष्या
,क्रोध
उत्पन्न होता
था ।
जो उनके
सामाजिक जीवन
में भी
दिखाई देता
था ।
इसके बाद
भी उनका
व्यक्ति एकदम
निराला, मौलिकता
भरा निविधपूर्ण
था ।
जिसमें भरपूर
आत्मविश्वास, उत्साह,
कार्यशीलता,
नजर
आती थी
।
पिता
जी ने
अपने जीवन
काल में
भरपूर
यश,प्रतिष्ठा,मान
सम्मान प्राप्त
किया और
राजा महाराजाओं
की तरह
शान की
जिन्दगी जी
है। ऐसे
यशस्वी पुरूष
को परिवार
सदा याद
रखेगा ।
पुत्र
(उमेश
कुमार गुप्ता
)
903 बाई
का बगीचा,
लवकुश
भवन
जबलपुर
(म0प्र0)
बच्चो का पहला मदरसा मां की गोद ही है।
1. बच्चो का पहला मदरसा मां की गोद ही है।
पेगंबर हजरत मोहम्मद
2. मां हर हाल में अपनी संतान का संरक्षण करती
है । वह कभी गलत हो ही नही सकती ।
आदि शंकराचार्य
3 जिन घरों में मां का सम्मान होता है, वे सर्व
श्रेष्ठ कुल परम्परा के है ।
गौतम बुद्ध
4. मां
वृद्ध हो जाए
तब भी उसकी उपेक्षा
कभी भूलकर मत करना ।
उसने जन्म दिया है।
हमेशा उसे सुनना ।
जीसस काइस्ट
5. मां. को देखना भी एक इबादत है ।
सूफी संत
ख्वाजा मोहनुद्दीन चिश्ती ।
पेगंबर हजरत मोहम्मद
2. मां हर हाल में अपनी संतान का संरक्षण करती
है । वह कभी गलत हो ही नही सकती ।
आदि शंकराचार्य
3 जिन घरों में मां का सम्मान होता है, वे सर्व
श्रेष्ठ कुल परम्परा के है ।
गौतम बुद्ध
4. मां
वृद्ध हो जाए
तब भी उसकी उपेक्षा
कभी भूलकर मत करना ।
उसने जन्म दिया है।
हमेशा उसे सुनना ।
जीसस काइस्ट
5. मां. को देखना भी एक इबादत है ।
सूफी संत
ख्वाजा मोहनुद्दीन चिश्ती ।
बुधवार, 21 अगस्त 2013
मॉं के संबोंधन
मॉं के संबोंधन
मां को ग्रीक में माना
चेचेन में नना
फ्रेंच में मिअर,मिमन,
हवालियन में मैकुअहिन
सबिZयन में मज्का,
बेलारूसियन में मेत्का,
यूक्रेनियन में माती,
पोलिस में मात्का एवं ममा,
बोिस्नयन/बल्गारियन मे माज्का
अफ्रीकन में मोइदर मां,
आईरिश में मदेर,
इंग्लिश में मदर, मॉम, मम्मी,
हिंदी मे मां, मांजी माता
,रोमेनियन में ममा माईका
, इटालियन/पर्शियन में माद्रे मम्मा,
अरेबिक में अम
, जर्मन मे मट्र
, रशियन में मैट,
लैटिन में मेटर
अल्बेनियन में मेमे,
नेने, बरिम,
मंगोलियन में इह,
जापानीज में ओकासन, हाहा,
उर्दू में अम्मी,
हंगोरियन में अन्या, फु,
टिर्कश में अन्ने, अना, वालिदे एवं
स्वीडिश में ममा, मोर, मोसाZ
से संबोधित किया जाता है।
मां को ग्रीक में माना
चेचेन में नना
फ्रेंच में मिअर,मिमन,
हवालियन में मैकुअहिन
सबिZयन में मज्का,
बेलारूसियन में मेत्का,
यूक्रेनियन में माती,
पोलिस में मात्का एवं ममा,
बोिस्नयन/बल्गारियन मे माज्का
अफ्रीकन में मोइदर मां,
आईरिश में मदेर,
इंग्लिश में मदर, मॉम, मम्मी,
हिंदी मे मां, मांजी माता
,रोमेनियन में ममा माईका
, इटालियन/पर्शियन में माद्रे मम्मा,
अरेबिक में अम
, जर्मन मे मट्र
, रशियन में मैट,
लैटिन में मेटर
अल्बेनियन में मेमे,
नेने, बरिम,
मंगोलियन में इह,
जापानीज में ओकासन, हाहा,
उर्दू में अम्मी,
हंगोरियन में अन्या, फु,
टिर्कश में अन्ने, अना, वालिदे एवं
स्वीडिश में ममा, मोर, मोसाZ
से संबोधित किया जाता है।
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